अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष...
विपरीत परिस्थितियों ने और मजबूत बनाया...
स्वास्थ्य के हर मोर्चे पर डटी है नर्सें...
रायगढ़ : अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं का सम्मान आम बात है। कई महिलाओं को सम्मान को दरकार नहीं होती। कई ऐसे भी हैं जो गुमनामी में चुपचाप अपनी क्षमता से अधिक कार्य कर योगदान दे रही हैं। इस खास दिवस पर हम लाए हैं मेडिकल कॉलेज के जिला अस्पताल की नर्सों की कहानी ..
नवजातों की सुपर मॉम छबीली...
छबीली पटेल (42) बीते 14 साल से नर्सिंग के पेशे में हैं और आज मेडिकल कॉलेज अस्पताल के नवजात सघन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। यह छबीली और उनकी टीम की मेहनत का नतीजा है कि सरकारी अस्पताल के सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सा इकाई पर लोगों का भरोसा समय के साथ और बढ़ा है। 22 बच्चों की क्षमता वाले एनआईसीयू में वर्तमान में 19 बच्चों की देखभाल वह अपनी टीम के साथ कर रही हैं। नवजातों के इलाज में लगी मशीनों में थोड़ी सी भी दिक्कत आने पर वह स्वास्थ्य विभाग के इंजीनियर को सूचना देती हैं और जब तक वह पहुंचते हैं अक्सर वह खुद से उसे ठीक कर देती है। यह उनकी लगन है जिसके कारण वह कुछ न कुछ सीखती हैं और नवजातों के बेहतरी में उसका प्रयोग करती हैं।
छबीली के साथी बताते हैं वह नवजातों की न सिर्फ इलाज करती हैं बल्कि उनके पालकों को बच्चों के जतन और उनके स्वास्थ्य को लेकर समझाती भी हैं। मरीजों की देखभाल करना हम अपने नर्सिंग के कोर्स में पढ़ते हैं पर सिस्टर छबीली को देखकर हम सीखते हैं। वह नवजातों की सुपर मॉम हैं।
छबीली कहती हैं : ”न्यूबोर्न इन्टेन्सिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में हम सभी अपना सर्वस्व झोंक देते हैं। नवजात अपनी समस्या कभी नहीं बताते हमें ही परीक्षण करना होता है। फिर चाहे वह 650 ग्राम के नवजात को स्वस्थ्य करना हो या फिर पीलिया से ग्रसित बच्चों की सतत निगरानी और फोटो थेरेपी देकर उसे स्वस्थ करना। जब पालक खुशी-खुशी अपने बच्चों को लेकर घर जाते हैं तो वही हमारी मेहनत का फल होता है। कोविड के दो साल का समय हमारे लिए बहुत ही मुश्किलों भरा था। बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए हमने खूब मेहनत की। संक्रमित प्रसूता के नवजातों की भी देखभाल हमने की, ऐसे बच्चों की तादाद 100 से अधिक थी। कम ही बच्चों में कोविड संक्रमण था लेकिन फिर भी एहतियात हमने बरती और वह बुरा दौर निकल गया। जिंदगी फिर पटरी पर लौट रही है। अभी के पालकों में बच्चों को लेकर जागरूकता की बहुत कमी है। मां के दूध का संदर्भ हो या फिर उनके खान-पान इसकी जानकारी तो होनी ही चाहिए। मेर वश में जितना होता है मैं उन्हें समझाती हूं फिर भी व्यापक स्तर पर चेतना आवश्यक है।“
मौतें ने झकझोरा, बच्चों ने संभाला : सौम्या
बत्तीस साल की के.सौम्या पिल्लई मेडिकल कॉलेज अस्पताल के शिशु वार्ड में पदस्थ हैं। इन्होंने 25,000 से अधिक लोगों को कोविड टीके से टीकाकृत किया है। 2014 से मेडिकल कॉलेज रायगढ़ जुड़ी सौम्या ने नर्सिंग क्षेत्र में खूब नाम कमाया है। फिर चाहे टीकाकरण ड्यूटी के दौरान साथियों को टीके बाद पड़ने वाले विपरीत प्रभाव (एईएफआई) को या फिर डेडिकेटेड कोविड अस्पलात में ड्यूटी के दौरान पीपीई किट की डॉनिंग-डॉफिंग(पहनना-उतारना) को लेकर साथियों को प्रशिक्षित करना। गंभीर इतना कि कोरोना संक्रमण की पहली और दूसरी लहर में 6 बार कोविड ड्यूटी लगने के बावजूद संक्रमित नहीं हुई। सौम्या के बुजुर्ग परिजन केरल में रहते हैं और कोविड संक्रमण शुरू होने से लेकर अब तक वह उनसे मिल नहीं पाई है। उन्हें कोविड खत्म होने का इंतजार है ताकि जो कि 2 साल लंबा हो चुका है। वह अपने परिजनों को संक्रमण से बचाना चाहती हैं।
नर्सिंग पेशे को जुनून की तरह देखने वाली सौम्या ने प्री-मेडिकल टेस्ट भी पास किया था, डॉक्टर बनने के लिए दो कॉलेज थे लेकिन उन्होंने नर्सिंग पेशे को चुना। सौम्या बताती हैं ”लोगों की सेवा करने में जो सुकून है वह कहीं है। हमें बच्चों के साथ बच्चा बनना पड़ता है ताकि वह शीघ्र ठीक हो सके। कोविड ड्यूटी के दौरान कम-से-कम 30 लोगों को अपने आंखो से सामने दम तोड़ते हुए देखा है। ज्यादातर ऐसे थे जो जीना चाहते थे लेकिन एक संक्रमण ने उनकी सारी उम्मीदें तोड़ दी। आज भी कई लोगों की बाते याद आती हैं बहुत बुरा लगता है पर हमें आगे बढ़ना है लोगों की सेवा करनी है। छोटे बच्चों की देखभाल से वह वाकये भूलते जा रहे हैं। कई ऐसे लोग हैं जिन्हें अपनी जिंदगी की कद्र नहीं है आत्महत्या जैसे कदम उठाते हैं। कोविड काल में गुजरे लोगों से उन्हें सबक लेना चाहिए। जिंदगी अनमोल है अपनों से बात करें।
एक दूसरे के हौसले से चुनौतियों को हराती : पुष्पलता पाणिग्रही
पुष्पलता पाणिग्रही यानी बेबी पुष्पा जो शहरी क्षेत्र की सुपरवाइजर हैं। इनके कंधे पर शहर की सभी 145 आंगनबाड़ी के निगरानी की जिम्मेदारी है। बीते महीने कुछ आंगनबाड़ी को कम कर दिया गया। बावन साल की पुष्पलता आज भी उतनी सक्रिय हैं जितनी 30 साल पहले नई नर्सिंग की नौकरी के समय थी। कोविड नियमों का पालन, टेस्टिंग, ट्रेसिंग, दवा वितरण और टीकाकरण सभी जगह पुष्पा ने ही नर्सिंग क्षेत्र का नेतृत्व किया। कई महीने परिजनों से दूर रहकर 18 घंटे तक काम किया। अब स्थिति सामान्य होने को है फिर भी हर दिन अपने क्षेत्र के आंगबाड़ियों की निगरानी वह करती हैं। मेडिकल कॉलेज की वह स्टाफ हैं तो बकायदा वहां जाकर नर्सिंग स्टाफ से मिलना और उन्हे कुछ न कुछ बताना उनकी दिनचर्या में शामिल हैं। उनकी साथी बताती हैं कि जब कभी किसी दिक्कत आती है तो वह सबसे पहले पुष्पा मैम से चर्चा करते हैं| वह सहज तरीके से उन्हे बता देती हैं। वह उन्हे बेबी कहती हैं। बेबी के पीछे की कहानी भी दिलचस्प हैं।
इस पर पुष्पलता बताती हैं ”हम नर्सिंग के पेशे में हैं और सरकारी अस्पताल में काम करती हैं। यदि एक दूसरे का नाम लेती हैं तो कई दफे मरीजे हमारा नाम लेकर परेशान करते हैं। नर्सिंग में लड़कियों की तादाद ज्यादा होती है और उनके नाम को सभी के सामने न लाया जाए इसलिए हम बेबी शब्द का इस्तेमाल अन्य नर्सों के लिए करती हैं। पहले की नर्सें ऐसा करती थी अभी इसकी प्रैक्टिस कम हो चली है।“
“बीते दो साल से काम का दबाव ज्यादा है। जब लगता है परिस्थियितां सामान्य हो रही हैं फिर कुछ हो जाता है। अपने साथियों का मनोबल कम न हो और वह परेशान न हो यही मेरी प्राथमिकता रहती है। नर्सिंग स्टाफ ने अपनी क्षमता से बहुत अधिक कार्य किया है। महीनों तक बिना छुट्टी के काम करना बोझिल कर देता है फिर भी हमारे तन्मयता में कमी नहीं आई। तबियत बिगड़ती, हौसला छूटता पर हमने एक दूसरे को संभाला।“
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