न्यूज़ डेस्क : मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में छत्तीसगढ़ी खानपान एवं व्यंजन विक्रय केन्द्र गढ़कलेवा शुरू करने के निर्देश दिए हैं। रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में प्रयोग के तौर पर छत्तीसगढ़ी खानपान एवं व्यंजन विक्रय केन्द्र संचालित है। यह रायपुर शहर के अन्य खान-पान केन्द्रों से प्रतिस्पर्धा करते हुए, गुणवत्ता और मानकों पर खरा उतरा है, जिससे पारंपरिक और स्वास्थ्यकर, स्वादिष्ट खान-पान को बल मिला है। मुख्यमंत्री के निर्देशों के अनुरूप संस्कृति विभाग द्वारा राज्य के सभी जिला मुख्यालयों में गढ़कलेवा शुरू किया गया है।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में खान-पान की विशिष्ट परंपराए हैं, जो हर प्रहर, बेला, मौसम और तीज त्यौहारों के अवसर पर पकाए, खाए और खिलाए जाते हैं। वनवासी-जनजातीय समाज का कलेवा मुख्यतः प्राकृतिक वनोपज पर आधारित है, तो जनपदीय संस्कृति के वाहकों के कलेवा में रोचक रसपूर्ण विविधता है। मांगलिक और गैरमांगलिक दोनों प्रसंग के व्यंजनों की अपार श्रृंखला है। ये व्यंजन भुने हुए, भाप से पकाये, तेल में तले और ये तीनों के बगैर भी तैयार होते हैं।
छत्तीसगढ़ के कुछ प्रमुख पकवानों में चीला, बेसन चीला, गुरहा चीला, फरा, मुठिया, धुसका, चाउर रोटी, चंउर पातर रोटी, खुपुर्री रोटी, बफौरी, चंवसेला, बरा, पताल चटनी, देहरउरी, अईरसा, दुधफरा, पकवा, ठेठरी, खुरमी, बिड़िया, पिड़िया, पपची, पूरन लाडू, करी लाडू, बुंदी लाडू, मुर्रा लाडू, लाई लाडू शामिल है।




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