- मनाई गई विवेकानंद जयंती...
- हाजिर जवाबी की कायल थी दुनिया...
- दुनिया को योग-वेदांत की शिक्षा से अवगत कराया...
बचपन से ही बुद्धिमान थे विवेकानंद : स्वामी जी बचपन से ही बहुत बुद्धिमान थे। कहा जाता है कि मां के आध्यात्मिक प्रभाव और पिता के आधुनिक दृष्टिकोण के कारण ही स्वामी जी को जीवन अलग नजरिए से देखने का गुण मिला। स्वामी जी के पिता कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक वकील थे। उनके दादा दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और फारसी भाषा के विद्वान थे और 25 वर्ष की आयु में साधु बन गए थे। पारिवारिक माहौल ने उनकी सोच को आकार देने में मदद की। नरेन बचपन से ही बहुत चंचल स्वभाव के थे। जैसे-जैसे वो बड़े होते गए, उनमें व्यावहारिक ज्ञान और पौराणिक समझ गहरी होती गई। उन्होंने पूरी दुनिया को अपनी बुद्धिमानी और हाजिर जवाबी का लोहा मनवाया। इन घटनाओं से लोग ना सिर्फ अचंभित रह गए बल्कि उनके व्यक्तित्व के प्रति लोगों का आकर्षण भी बढ़ता गया।
संतोष पूरी गोस्वामी, पार्षद वार्ड नं 04 : स्वामी विवेकानंद ने ही रामकृष्ण मठ, रामकृष्ण मिशन और वेदांत सोसाईटी की नींव रखी थी। स्वामी जी की बुद्धिमानी और हाजिर जवाबी की पूरी दुनिया कायल थी और आज भी स्वामी जी के विचार प्रेरणादायक हैं।
पुनम यादव, : स्वामी विवेकानंद बहुत कम उम्र में ही सन्यासी बन गए थे। पश्चिमी देशों को योग-वेदांत की शिक्षा से अवगत करने का श्रेय स्वामी जी को ही जाता है। इसलिए हम सबको योग के प्रति विश्वास और अपने जीवन में योग को शामिल करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से स्वामी विवेकानंद ने 39 वर्ष के उम्र में संक्षिप्त जीवनकाल में जो काम कर गये वह आने वाली अनेक शताब्दियों तक कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
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