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विवेकानांद जयंती पर कोरोना नियमों के तहत मनाई गयी जयंती...

  •  मनाई गई विवेकानंद जयंती...
  • हाजिर जवाबी की कायल थी दुनिया...
  • दुनिया को योग-वेदांत की शिक्षा से अवगत कराया...
गरियाबंद : स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। इस अवसर को भारत देश में युवा दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद जयंती के मौके पर फिंगेश्वर के स्वामी विवेकानन्द स्मारक समिति के सदस्यों ने नगर के कन्या शाला स्थित स्वामी विवेकानंद की स्मारक पर माल्यार्पण कर पार्षद निधि से स्कूल के सामने बनाए गए उद्यान को पेड़-पौधे लगा कर हरा भरा रखने का संकल्प लिया और साथ ही स्वामी जी के पदचिन्हों पर चलने का भी संकल्प लिया। कोरोना नियम का पालन करते हुए मनाई गई जयंती के अवसर पर कम संख्या में उपस्थित हो कर विशेष तौर पर नगर के युवा वर्ग ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। सभी सदस्यों ने स्वामी जी के चरणों में श्रद्धा सुमन पुष्प अर्पित की। फिर उनके बताए मार्ग पर चलने का वचन लिया। जयंती के इस अवसर पर स्वामी विवेकानन्द स्मारक समिति से संतोष पूरी गोस्वामी, पुनम यादव, नेमिचंद् जैन, सुयश सोनी, तुकेश सिंहा, राजू चक्रधारी, सुरेंद्र चक्रधारी आदि उपस्थित थे।

बचपन से ही बुद्धिमान थे विवेकानंद : स्वामी जी बचपन से ही बहुत बुद्धिमान थे। कहा जाता है कि मां के आध्यात्मिक प्रभाव और पिता के आधुनिक दृष्टिकोण के कारण ही स्वामी जी को जीवन अलग नजरिए से देखने का गुण मिला। स्वामी जी के पिता कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक वकील थे। उनके दादा दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और फारसी भाषा के विद्वान थे और 25 वर्ष की आयु में साधु बन गए थे। पारिवारिक माहौल ने उनकी सोच को आकार देने में मदद की। नरेन बचपन से ही बहुत चंचल स्वभाव के थे। जैसे-जैसे वो बड़े होते गए, उनमें व्यावहारिक ज्ञान और पौराणिक समझ गहरी होती गई। उन्होंने पूरी दुनिया को अपनी बुद्धिमानी और हाजिर जवाबी का लोहा मनवाया। इन घटनाओं से लोग ना सिर्फ अचंभित रह गए बल्कि उनके व्यक्तित्व के प्रति लोगों का आकर्षण भी बढ़ता गया। 

संतोष पूरी गोस्वामी, पार्षद वार्ड नं 04 : स्वामी विवेकानंद ने ही रामकृष्ण मठ, रामकृष्ण मिशन और वेदांत सोसाईटी की नींव रखी थी। स्वामी जी की बुद्धिमानी और हाजिर जवाबी की पूरी दुनिया कायल थी और आज भी स्वामी जी के विचार प्रेरणादायक हैं।

पुनम यादव, : स्वामी विवेकानंद बहुत कम उम्र में ही सन्यासी बन गए थे। पश्चिमी देशों को योग-वेदांत की शिक्षा से अवगत करने का श्रेय स्वामी जी को ही जाता है। इसलिए हम सबको योग के प्रति विश्वास और अपने जीवन में योग को शामिल करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से स्वामी विवेकानंद ने 39 वर्ष के उम्र में संक्षिप्त जीवनकाल में जो काम कर गये वह आने वाली अनेक शताब्दियों तक कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

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